
मेरा अर्जुन तू ही होगी
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दुहिता, जब तूने जन्म लिया
और आई मेरे हाथों में ,
मैंने तुझको यह वचन दिया
सुन ले मेरी इन बातों में I
मेरी माँ ने जो नहीं कहा,
वह सब अब तू मुझसे सुन ले I
सौभाग्यकांक्षिणी, धीर नहीं,
जीवन-रण का तू वीर बने II
कुल का मेरे कुलदीपक तू,
सूरज सा तुझमें तेज जगे I
कुछ ऐसा करे दुहिता मेरी,
संसार में जो रश्मि भर दे II
साहस तेरा आभूषण हो,
अंतर्मन, दर्पण बन दिखा सके I
कुछ ऐसी हो दुहिता मेरी,
भेड़ों की भीड़ में सिंहनी सी II
तू तीर चला, तलवार उठा,
वह कर जो करना चाहेगी I
आरण्य काटकर, मार्ग बना,
तू स्वयम् बढ़े आह्लादित सी II
किसी और के घर का नूर नहीं,
मेरे घर का उजियारा तू I
प्राणों का मेरे है टुकड़ा,
मेरी आँखों का तारा तू II
एक तुला है सबके पास यहाँ,
जो तुझको कम कर तोलेगी I
वह तुला तोड़ने में दुहिता,
मैं भी हूँ तेरे साथ खड़ी II
अरमानों, एहसानों का जग,
तुझ पर घूंघट डालेगा I
सीमाएँ तेरी तय करके,
कर्तव्यों तले दबा लेगा II
फिर ऐसे ऐसे शस्त्र लिए,
हर ओर से तुझपर टूटेगा I
भयभीत न हो दुहिता मेरी,
शत्रु का दंभ ही छूटेगा II
उन सब की बात न सुनना तू,
वे तेरे बल से डरते हैं I
रेखाएँ खींच, रीतियाँ बना,
तेरे पौरुष से लड़ते हैं II
करुणा, ममता हर मनुज में हो,
यह केवल तेरा काम नहीं I
जीवन जीने को मिला तुझे,
समझौते का यह नाम नहीं II
जब अपने हीं व्यवधान बनें,
तेरे अधिकार न तुझको दे I
तब मोह के आड़म्बर को हटा,
उनपर अपना गांडीव चला II
अपनी माँ का आशीष तुझे,
जग से लड़ के लेना होगा I
जो तुझको कम कर आँक रहे,
उनको उत्तर देना होगा II
साहस, असीम बल है तुझमें,
फिर भी यह तुझसे कहती हूँ ;
है जीवन-पथ आसान नहीं,
मैं आज भी अपने रण में हूँ II
अपनी शक्ति पहचान शीघ्र,
यह रण आसान नहीं होगी!
पर अडिग अटल विश्वास मेरा.
मेरा अर्जुन तू ही होगी।I

पत्र – मंजुषा
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पगडंडी के अंतिम पग पर
वट का था एक वृक्ष विशाल ।
रक्त वर्ण की पत्र मंजुषा
जिसके तल में खड़ी निढाल।।
हर भोर रवि की किरणों के संग
उठता वट , उसका परिवार ।
जंग लगे उस श्याम – शीश पर
छा जाती थी चमक निहाल।।
सुबह सुनहरी, नए दिवस का
मुस्काकर कभी सत्कार।
रक्त वर्ण की पत्र मंजुषा
नव चुनौतियों को तैयार।।
वट से उतरी मूढ़ गोरैया
कभी – कभी करती उपकार।
बैठ शीश पर , चोंच मार कर
‘टक – टक , टक – टक’, पूछे हाल।।
पगडंडी पर सुबह शाम थे
पथिक अनेकों आते ।
पर उनपर कुछ ऐसा न था
जो उसको भी दे जाते ।।
यदि किसी ने भूलचूक वश
कृपा की उसपर नजर डाल ,
रुका नहीं वह दो पल, केवल
हँसा देखकर उसका हाल ।
चली हवा , बरसात हुई
चमका सूरज वर्चस्व दिखाए ।
रक्त वर्ण की पत्र मंजुषा
खड़ी रही मुस्काए ।।
जीर्ण शीर्ण जीवन का उसने
कभी न शोक मनाया ।
पर कुछ प्रश्न किए उससे
जिसने था उसे बनाया ।।
“कागज के छोटे टुकड़ों में
रहता था कितना प्यार भरा !
क्या नहीं चाहिए तुमको अब
वह प्यार , दुलार, लगाव जरा?”
कुछ सीधी, आड़ी-टेढ़ी रेखाएँ
कितना सब कह जाती थी!
क्या नहीं चाहिए अब तुमको
वह मधुर महक जो आती थी ?
लिखने बैठो तो कलम साथ दे
ज्यादा ही लिख जाती थी!
पढ़ने वाले की खुशी सोंच
आँखें छल – छल हो जाती थीं।
पहचाने से अक्षर छूकर
ऐसा लगता छू लिया उन्हें
क्या नहीं चाहिए अब तुमको
एक अपने का वह स्नेह – स्पर्ष ?
जब छोटा सा बक्सा निकला
एक नए पत्र को रखने को,
क्या नहीं चाहिए पुल्कित मन
देखकर, प्यार भरे वो खत ढ़ेरों ?’
जाने उसके प्रश्न किसी ने
सुने भी या न सुन पाए !
रक्त वर्ण की पत्र मंजुषा
खड़ी रही मुस्काए ।

आमंत्रण
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भागिरथी के तट पर था,
ऐसा अलौकिक नगर बसा;
अब भी जिसके गौरव की,
स्मृतिमाँ जीवंत हैं कई वहाँ II
वैदेही विदेह में जन्मीं,
आर्यभट्ट ने शून्य दिया I
ब्रह्मवादिनी गर्ग-पुत्री ने,
वहीं तो था शास्त्रार्थ किया II
पतंजली ने महाभाष्य और
योग सूत्र की रचना की I
आदि कवि श्री वाल्मिकी ने
रामायण भी यहीं लिखी II
तिमिर अंत करने को जग का,
बुद्ध ने था अवतार लिया I
देकर स्वर्णिम चिन्ह शारदूल,
मौर्यों ने इतिहास रचा II
कालिदास ने लिखी शकुंतला,
कथक ने मुद्राएँ पाईं I
मिथिला के रंगों की कीर्ति,
विश्व में अब भी है छाई II
नालंदा, विक्रमशिला के जैसे,
ज्ञान पुंज से स्थान यहाँ I
यहीं कर्ण ने इंद्र देव को,
कवच व कुण्डल दान दिया II
ध्रुवनंदा की वेग गाति से,
समय का कैसा चक्र चला I
निर्वाण-प्रदत इस मिट्टी का,
अपना ही गौरव लुप्त हुआ !
ज्ञान, धर्म और राजऋषि,
वीरों, पीरों की भूमि पर;
क्यों कैवल अवशेष रह गए,
इस प्राणहीन सी भूमि पर ?
क्यों स्वर्णाक्षर क्षीण पड़ गए,
काल के क्रियाकलापों में ?
केवल प्रसंग बन दीख रहे,
ऐसे ही कुछ आलापों में !
अब जरा रुकें, कुछ प्रश्न करें;
सम्भवत: इन प्रश्नों में कहीं उत्तर हो छुपा I
यदि हम ने ना सीखा अब भी,
इतिहास का क्या औचित्य बचा!
कितनों को ऐसा लगा, कि लो,
यह तो भारत की बात चली I
और कितनों ने देखा केवल,
छोटा सा एक प्रांत अभी II
मैंने एक प्रांत की बात न की,
मनशा भारत-माहिमा गान की थी I
शुरुआत वहाँ की कविता,
शैशव से जहाँ की कथा सुनी II
दिव्यधाम यह देश, यहाँ,
हर कण की अद्भुत गाथा है I
वह बंग हो या बुंदेलखण्ड,
सबकी अपनी परिमाषा है II
जब इनको जोड़ सकेंगे हम,
नव स्वप्न सृजन हो पाएगा I
यदि पृथक – पृथक कर देखेंगे,
कुछ भी ना रह जाएगा II
पर अपने हीं अन्तर्द्वन्दों में,
हम अब भी ऐसे पड़ते हैं;
अरि द्वार खड़ा ललकार रहा,
हम निज कुटुम्भ में लड़ते हैं II
भाषा, धर्म, प्रान्त को लेकर,
क्या आज भी हैं हम वहीं खड़े;
तुज्छ अहम् -अभिमानों पर
जहाँ युद्ध हुए थे बड़े-बड़े?
उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम,
तेरा मेरा कर काट दिया!
देखो हमने अपनी माँ को,
कितने हिस्सों में बाँट दिया II
सोंचो कि कितनों ने अपने
बच्चों से ये बात कही,
कितनों ने है उन्हें बताया,
मातृभूमि का अर्थ कभी II
समय आ गया है कि अब,
पूरब पश्चिम के गीत गढ़े I
राजस्थान में शैया पर माँ,
केरल की एक कथा कहे II
मेवाड़ के राणा की कहानियाँ,
त्रिपुरा के भी बच्चे जाने I
कन्याकुमारी में मिथिला के,
गीतों, रंगों को पहचानें II
आमंत्रण है मेरा सबको,
उत्कंठा अपनी छोड़ सकें I
और फिर मेरी इस रचना में,
कुछ पँक्ति अपनी जोड़ सके II
यदि भारत के हर कोने से,
एक एक पँक्ति भी आएगी;
मेरी छोटी सी यह कविता,
एक महाकाव्य बन जाएगी II